इतना टूटा हूँ की अब छूने से बिखर जाऊंगा,
अब अगर दुआ भी दोगे तो मर जाऊंगा,
पूँछ कर मेटा पता वक़्त जाया न करो,
मै तो बंजारा हूँ न जाने किधर जाऊंगा,
हर तरफा धुंध है जुगनू है न चिराग कोई,
कौन पहचानेगा बस्ती में अगर जाऊंगा,
जिंदगी भर मै मुसाफिर हूँ तेरी कश्ती का,
तू जहाँ मुझसे कहेगी मै उतर जाऊंगा,
फूल रह जायेंगे गुलदान में यादो की तरह,
मै तो खुशबू हूँ फिजाओं में बिखर जाऊंगा.
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हम तेरे शहर में आये है मुसाफिर की तरह,
बस एक बार मुलाकात का मौका दे-दे,
मेरी मंजिल है कहाँ, मेरा ठिकाना है कहाँ,
सुबह तक तुझसे बिछड़ कर मुझे जाना है कहाँ,
सोंचने के लिए एक रात का मौका दे-दे,
अपने आँखों में छुपा रखे है दर्द मैंने,
अपनी पलकों पे सजा रखे है आंशूं मैंने,
मेरी आँखों को भी बरसात का मौका दे-दे,
आज की रात मेरी दर्द-ऐ-मोहोब्बत सुनले,
कंप-कंपाते हुए होंठो की शिकायत सुन ले,
इस इजहारे शिकायत का मौका दे-दे....
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जब हम तनहा हो तो बस साथ देना,
रोये आंखें तो आंशूं पोंछ देना,
क्यूंकि जिन्दा है जब तक ही सतायेंगे,
वादा करते है मरने के बाद तुम्हे याद तक न आयेंगे
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कौन किसको दिल में जगह देता है,
दरखत भी सूखे पत्तो को गिरा देता है,
वाकिफ है हम दुनिया के रिवाजों से,
दिल भर जाये तो हर कोई ठुकरा देता है.
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चाहत के परदे में नफरत है मुमकिन,
तो नफरत के परदे में चाहत भी होगी,
खफा होता है कोई तुम्हे अपना समझकर,
तो उसको तुमसे मोहब्बत भी होगी
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गम न हो वहां, जहाँ हो फ़साना आपका,
खुशियाँ ढ़ूढ़ती रहें आशियाना आपका,
वो वक़्त ही न आये जब आप उदास हो,
ये दुनिया देखती रहे मुस्कुराना आपका
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मत पूंछ मेरे सब्र की इन्तहा कहा तक है,
तू सितम कर ले तेरी ताकत जहा तक है,
वफ़ा की उम्मीद तो हमे थी नहीं तुझसे,
अब तो देखना है की तू बेवफा कहा तक
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Monday, January 4, 2010
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